संसार की प्रत्येक वस्तु, चाहे वह एक छोटी सुई हो या एक विशाल पर्वत, सूक्ष्म कणों से मिलकर बनी है। इन सूक्ष्म कणों को वैज्ञानिक भाषा में परमाणु (Atom) और अणु (Molecule) कहते हैं। प्राचीन भारतीय ऋषियों ने भी अपने वेदों और दर्शन ग्रंथों में पदार्थ को अत्यंत सूक्ष्म कणों (परमाणु) से बना बताया था। आधुनिक युग में जॉन डाल्टन ने परमाणुवाद को एक वैज्ञानिक सिद्धांत का रूप दिया। इस अध्याय में हम द्रव्यमान संरक्षण के नियम, स्थिर अनुपात के नियम, डाल्टन के परमाणु सिद्धांत, परमाणु द्रव्यमान, अणु, आयन तथा रासायनिक सूत्रों का अध्ययन करेंगे।
रसायन विज्ञान में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसी रासायनिक अभिक्रिया में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं। वैज्ञानिकों ने सदियों के अवलोकन के बाद दो मूलभूत नियमों की खोज की — द्रव्यमान संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Mass) तथा स्थिर अनुपात का नियम (Law of Constant Proportion)। इन नियमों ने यह स्थापित किया कि रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न तो नष्ट होता है और न ही बनता है, तथा किसी यौगिक में तत्वों का अनुपात सदैव निश्चित रहता है। इन्हीं नियमों के आधार पर डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत प्रतिपादित किया।
परमाणुओं और अणुओं को समझना आवश्यक है क्योंकि रासायनिक अभिक्रियाएँ वास्तव में इन्हीं सूक्ष्म कणों के बीच होने वाली प्रक्रियाएँ हैं। किसी भी रासायनिक अभिक्रिया को संतुलित समीकरण के रूप में लिखने के लिए हमें परमाणुओं की संख्या तथा द्रव्यमान को संतुलित रखना पड़ता है। इस अध्याय में हम सीखेंगे कि रासायनिक सूत्र कैसे लिखे जाते हैं, अणु का द्रव्यमान कैसे ज्ञात करते हैं तथा मोल की अवधारणा क्या है। ये सभी ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने की दिशा में प्रथम सोपान हैं।
फ्रांसीसी वैज्ञानिक आंत्वां लवाज़िए (Antoine Lavoisier) ने 1789 में यह नियम प्रतिपादित किया। इस नियम के अनुसार — "किसी भी रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान का न तो सृजन होता है और न ही विनाश होता है; अभिक्रिया से पहले अभिकारकों का कुल द्रव्यमान, अभिक्रिया के बाद बने उत्पादों के कुल द्रव्यमान के बराबर होता है।"
उदाहरण के लिए, यदि हम सोडियम कार्बोनेट के विलयन को कैल्शियम क्लोराइड के विलयन के साथ एक बंद बर्तन में मिलाते हैं, तो कैल्शियम कार्बोनेट (सफेद अवक्षेप) तथा सोडियम क्लोराइड बनता है। बर्तन का कुल द्रव्यमान अभिक्रिया से पहले और बाद में समान रहता है। इस प्रयोग से द्रव्यमान संरक्षण के नियम की पुष्टि होती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अभिक्रिया को बंद बर्तन में करने पर ही सही परिणाम मिलता है, क्योंकि खुले बर्तन में बनी गैसें बाहर निकलकर द्रव्यमान को कम कर सकती हैं।
द्रव्यमान संरक्षण के नियम को गणितीय रूप में निम्न प्रकार लिखा जा सकता है:
Σ अभिकारकों का द्रव्यमान = Σ उत्पादों का द्रव्यमान
इस नियम का महत्व यह है कि इसके आधार पर ही रासायनिक समीकरणों को संतुलित किया जाता है। किसी भी संतुलित रासायनिक समीकरण में दोनों ओर प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की संख्या समान होती है।
इस नियम के अनुसार — "किसी रासायनिक यौगिक में तत्व सदैव निश्चित द्रव्यमान अनुपात में उपस्थित होते हैं।" इसे निश्चित अनुपात का नियम भी कहते हैं। जल (H₂O) में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का द्रव्यमान अनुपात सदैव 1:8 होता है, चाहे जल किसी भी स्रोत से प्राप्त हो। कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) में कार्बन और ऑक्सीजन का द्रव्यमान अनुपात सदैव 3:8 होता है।
अमोनिया (NH₃) में नाइट्रोजन और हाइड्रोजन का द्रव्यमान अनुपात 14:3 रहता है। यदि किसी यौगिक में तत्वों का अनुपात निश्चित नहीं होगा, तो वह यौगिक नहीं, बल्कि मिश्रण होगा। यही नियम तत्वों तथा यौगिकों में अंतर स्पष्ट करता है। स्थिर अनुपात का नियम यह दर्शाता है कि प्रत्येक यौगिक का एक निश्चित सूत्र होता है, जिसमें तत्वों की संख्या निश्चित रहती है।
जॉन डाल्टन (John Dalton) ने सन् 1808 में परमाणु सिद्धांत प्रतिपादित किया, जो आधुनिक रसायन विज्ञान की नींव है। इस सिद्धांत की मुख्य अवधारणाएँ निम्नलिखित हैं:
डाल्टन का सिद्धांत बहुत हद तक सही सिद्ध हुआ, परंतु बाद में यह ज्ञात हुआ कि परमाणु वास्तव में विभाज्य होते हैं (उनमें इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन होते हैं), तथा किसी तत्व के परमाणु समान नहीं होते (समस्थानिक होते हैं)। फिर भी यह सिद्धांत रसायन विज्ञान में क्रांति लाने वाला सिद्ध हुआ।
परमाणु अत्यंत सूक्ष्म होते हैं, इसलिए उनका द्रव्यमान सामान्य इकाइयों में व्यक्त करना कठिन है। वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक विशेष इकाई बनाई, जिसे परमाणु द्रव्यमान इकाई (Atomic Mass Unit, u) कहते हैं। एक परमाणु द्रव्यमान इकाई कार्बन-12 (C-12) परमाणु के द्रव्यमान का बारहवाँ भाग है। गणितीय रूप में:
1 u = (1/12) × C-12 परमाणु का द्रव्यमान
व्यवहार में 1 u ≈ 1.6605 × 10^-27 kg होता है। किसी तत्व के परमाणु का द्रव्यमान जो इस इकाई में व्यक्त किया जाता है, उसे परमाणु द्रव्यमान कहते हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन का परमाणु द्रव्यमान 1 u, ऑक्सीजन का 16 u, नाइट्रोजन का 14 u, कार्बन का 12 u तथा सल्फर का 32 u होता है। परमाणु द्रव्यमान प्रायः पूर्णांक में होता है। परमाणु त्रिज्या को नैनोमीटर (1 nm = 10^-9 m) में मापा जाता है।
किसी अणु का द्रव्यमान उसमें उपस्थित सभी परमाणुओं के द्रव्यमानों के योग के बराबर होता है। इसे अणु द्रव्यमान कहते हैं। उदाहरण के लिए, जल (H₂O) का अणु द्रव्यमान = 2 × 1 + 16 = 18 u; कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का अणु द्रव्यमान = 12 + 2 × 16 = 44 u; नाइट्रोजन गैस (N₂) का अणु द्रव्यमान = 2 × 14 = 28 u।
मोल रसायन विज्ञान की आधारभूत इकाई है। एक मोल किसी पदार्थ की उतनी मात्रा है, जितनी में कणों (परमाणुओं, अणुओं या आयनों) की संख्या आवोगाद्रो संख्या (6.022 × 10^23) के बराबर होती है। इसलिए:
1 मोल = 6.022 × 10^23 कण
किसी तत्व का ग्राम-परमाणु द्रव्यमान (Gram Atomic Mass) वह द्रव्यमान है, जो उस तत्व के एक मोल परमाणुओं में होता है। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन का ग्राम-परमाणु द्रव्यमान 16 ग्राम है। किसी यौगिक का ग्राम-अणु द्रव्यमान (Gram Molecular Mass) उस यौगिक के एक मोल अणुओं का द्रव्यमान है। जल का ग्राम-अणु द्रव्यमान 18 ग्राम है, अर्थात 1 मोल जल का द्रव्यमान 18 ग्राम होता है। किसी तत्व का ग्राम-परमाणु द्रव्यमान या ग्राम-अणु द्रव्यमान के बराबर द्रव्यमान को एक मोल कहा जाता है।
मोलों की संख्या = (पदार्थ का द्रव्यमान ÷ ग्राम-अणु द्रव्यमान)
उदाहरण के लिए, 90 ग्राम जल में मोलों की संख्या = 90 ÷ 18 = 5 मोल।
अणु किसी पदार्थ का सबसे छोटा कण है, जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है तथा पदार्थ के सभी गुणधर्मों को प्रदर्शित करता है। अणु दो या अधिक परमाणुओं के रासायनिक संयोग से बनता है। अणु दो प्रकार के होते हैं — तत्वों के अणु और यौगिकों के अणु।
तत्वों के अणु: किसी तत्व के अणु में उसी तत्व के एक या अधिक परमाणु होते हैं। ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन जैसी गैसों के अणु में दो परमाणु होते हैं (O₂, N₂, H₂), इसलिए उन्हें द्विपरमाणुक (Diatomic) अणु कहते हैं। ओज़ोन (O₃) में तीन परमाणु होते हैं (त्रिपरमाणुक), जबकि फॉस्फोरस (P₄) तथा सल्फर (S₈) में क्रमशः चार और आठ परमाणु होते हैं। उत्कृष्ट गैसें (हीलियम, नियॉन, आर्गन) एकपरमाणुक (Monoatomic) होती हैं।
यौगिकों के अणु: किसी यौगिक के अणु में विभिन्न तत्वों के परमाणु निश्चित अनुपात में उपस्थित होते हैं। जल का अणु (H₂O) दो हाइड्रोजन तथा एक ऑक्सीजन परमाणु से बना होता है। अमोनिया का अणु (NH₃) एक नाइट्रोजन तथा तीन हाइड्रोजन परमाणुओं से बना होता है। कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का अणु एक कार्बन तथा दो ऑक्सीजन परमाणुओं से बना होता है।
विद्युत आवेशित कण को आयन (Ion) कहते हैं। धनावेशित आयन को धनायन (Cation) कहते हैं, जैसे Na⁺, K⁺, Ca²⁺, Al³⁺, NH₄⁺। ऋणावेशित आयन को ऋणायन (Anion) कहते हैं, जैसे Cl⁻, O²⁻, SO₄²⁻, CO₃²⁻। किसी यौगिक में धनायन तथा ऋणायन दोनों उपस्थित होते हैं तथा कुल आवेश शून्य रहता है। सोडियम क्लोराइड (NaCl) में Na⁺ और Cl⁻ आयन होते हैं। जल में सोडियम क्लोराइड घुलने पर Na⁺ और Cl⁻ आयनों में विभक्त हो जाता है, इसलिए नमक का जलीय विलयन विद्युत का चालक होता है।
किसी यौगिक का रासायनिक सूत्र उस यौगिक में उपस्थित तत्वों के प्रतीकों तथा उनकी संख्या को दर्शाता है। रासायनिक सूत्र लिखने के लिए सर्वप्रथम तत्वों के प्रतीकों (Symbols) का ज्ञान आवश्यक है। जे. जे. बर्ज़ेलियस ने तत्वों के प्रतीकों के लिए प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक तत्व के लिए उसके अंग्रेज़ी या लैटिन नाम का एक या दो अक्षर का प्रतीक प्रयुक्त हो। कुछ प्रतीक तत्व के अंग्रेज़ी नाम से, कुछ लैटिन नाम से लिए गए हैं। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन (H), ऑक्सीजन (O), कार्बन (C), नाइट्रोजन (N) अंग्रेज़ी से हैं, जबकि सोडियम (Na, Natrium), पोटैशियम (K, Kalium), लोहा (Fe, Ferrum), ताँबा (Cu, Cuprum), सोना (Au, Aurum), चाँदी (Ag, Argentum) लैटिन नामों से लिए गए हैं।
रासायनिक सूत्र लिखने के लिए दो चरण अपनाए जाते हैं:
उदाहरण — सोडियम क्लोराइड: Na⁺ और Cl⁻, क्रॉस विधि से NaCl। कैल्शियम क्लोराइड: Ca²⁺ और Cl⁻, क्रॉस विधि से CaCl₂। मैग्नीशियम ऑक्साइड: Mg²⁺ और O²⁻, क्रॉस विधि से MgO। एल्युमिनियम ऑक्साइड: Al³⁺ और O²⁻, क्रॉस विधि से Al₂O₃। कैल्शियम कार्बोनेट: Ca²⁺ और CO₃²⁻, क्रॉस विधि से CaCO₃।
| यौगिक | सूत्र | यौगिक | सूत्र |
|---|---|---|---|
| जल | H₂O | सोडियम क्लोराइड | NaCl |
| कार्बन डाइऑक्साइड | CO₂ | कैल्शियम क्लोराइड | CaCl₂ |
| अमोनिया | NH₃ | मैग्नीशियम ऑक्साइड | MgO |
| मीथेन | CH₄ | एल्युमिनियम ऑक्साइड | Al₂O₃ |
| सल्फ्यूरिक अम्ल | H₂SO₄ | नाइट्रिक अम्ल | HNO₃ |
किसी रासायनिक अभिक्रिया को संतुलित करने के लिए अभिक्रिया के दोनों ओर प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की संख्या समान करनी पड़ती है। यह द्रव्यमान संरक्षण के नियम के अनुसार आवश्यक है। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के संयोग से जल बनने की अभिक्रिया:
H₂ + O₂ → H₂O (असंतुलित)
संतुलित समीकरण: 2H₂ + O₂ → 2H₂O
इस संतुलित समीकरण में दोनों ओर हाइड्रोजन के 4 परमाणु तथा ऑक्सीजन के 2 परमाणु हैं। द्रव्यमान संरक्षण के नियम के अनुसार अभिक्रिया से पहले और बाद का कुल द्रव्यमान समान रहता है।
| तत्व | प्रतीक | परमाणु द्रव्यमान (u) |
|---|---|---|
| हाइड्रोजन | H | 1 |
| कार्बन | C | 12 |
| नाइट्रोजन | N | 14 |
| ऑक्सीजन | O | 16 |
| सोडियम | Na | 23 |
| मैग्नीशियम | Mg | 24 |
| एल्युमिनियम | Al | 27 |
| सल्फर | S | 32 |
| पोटैशियम | K | 39 |
| कैल्शियम | Ca | 40 |
| यौगिक | गणना | अणु द्रव्यमान (u) |
|---|---|---|
| जल (H₂O) | 2×1 + 16 | 18 |
| कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) | 12 + 2×16 | 44 |
| अमोनिया (NH₃) | 14 + 3×1 | 17 |
| सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) | 2×1 + 32 + 4×16 | 98 |
| नाइट्रोजन गैस (N₂) | 2×14 | 28 |
| नियम | प्रतिपादक | मूल कथन |
|---|---|---|
| द्रव्यमान संरक्षण | लवाज़िए | द्रव्यमान न तो बनता है, न नष्ट होता है |
| स्थिर अनुपात | प्राउस्ट | यौगिक में तत्व निश्चित अनुपात में |
| परमाणु सिद्धांत | डाल्टन | परमाणु अविभाज्य कण |
इस अध्याय में हमने सीखा कि संसार की समस्त वस्तुएँ परमाणुओं और अणुओं से मिलकर बनी हैं। द्रव्यमान संरक्षण का नियम कहता है कि रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान न तो बनता है और न ही नष्ट होता है, जबकि स्थिर अनुपात का नियम कहता है कि किसी यौगिक में तत्व निश्चित द्रव्यमान अनुपात में होते हैं। इन नियमों के आधार पर डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत दिया। परमाणु द्रव्यमान को परमाणु द्रव्यमान इकाई (u) में मापा जाता है, जहाँ 1 u कार्बन-12 के द्रव्यमान का बारहवाँ भाग है। अणु किसी पदार्थ का सबसे छोटा स्वतंत्र कण है, जो तत्वों के अणु या यौगिकों के अणु हो सकते हैं। आयन विद्युत आवेशित कण हैं, जो धनायन या ऋणायन होते हैं। रासायनिक सूत्र तत्वों के प्रतीकों तथा क्रॉस विधि द्वारा लिखे जाते हैं, और रासायनिक समीकरणों को द्रव्यमान संरक्षण के अनुसार संतुलित किया जाता है। मोल अवधारणा हमें पदार्थ की मात्रा को कणों की संख्या से जोड़ती है। यह ज्ञान रसायन विज्ञान की आधारशिला है और आगे के अध्ययन (परमाणु संरचना, रासायनिक अभिक्रियाएँ, स्टॉइकियोमेट्री) के लिए अत्यंत आवश्यक है।