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1. परिचय

पृथ्वी पर लाखों प्रकार के जीव पाए जाते हैं — छोटे जीवाणुओं से लेकर विशाल हाथी तथा नीली व्हेल तक। इन जीवों में दिखने वाले रूपों, रंगों, आकारों तथा जीवन-शैली की विविधता को जैव विविधता (Biodiversity) कहते हैं। जीवों की इस विशाल विविधता को सुव्यवस्थित ढंग से समझने के लिए उनका वर्गीकरण (Classification) किया जाता है। इस अध्याय में हम जीवों के वर्गीकरण के आधार, पाँच जगत वर्गीकरण तथा पौधों और जन्तुओं के प्रमुख वर्गों का अध्ययन करेंगे।

जीवों का वर्गीकरण करना आवश्यक है, क्योंकि इससे हम असंख्य जीवों को सुव्यवस्थित रूप से पहचान सकते हैं, उनके नामकरण तथा संबंधों का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। वर्गीकरण समानता तथा असमानता के आधार पर किया जाता है। एक जीव को पहचानने के लिए उसके वंशक्रम (Ancestry), समान संरचना तथा कार्यप्रणाली आदि का अध्ययन किया जाता है। वैज्ञानिकों ने जीवों को वर्गीकृत करने के लिए अनेक विधियाँ प्रस्तुत की हैं, जिनमें से कार्ल वोएज़ और व्हिटेकर के वर्गीकरण प्रमुख हैं।

वर्गीकरण की क्रमबद्ध श्रेणियाँ होती हैं, जिन्हें वर्गीकरणीय श्रेणियाँ कहते हैं। सबसे बड़ी श्रेणी जगत (Kingdom) है तथा सबसे छोटी श्रेणी जाति (Species) है। पहचान के आधार पर जीवों को वर्ग, गण, कुल, वंश तथा जाति में विभाजित किया जाता है। जिस वैज्ञानिक विधि से जीवों को निश्चित नाम दिया जाता है, उसे द्विपद नामकरण (Binomial Nomenclature) कहते हैं, जिसे कैरोलस लीनियस ने प्रस्तुत किया। इस अध्याय में हम इन सभी अवधारणाओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

2. वर्गीकरण की आवश्यकता और आधार (Need and Basis of Classification)

पृथ्वी पर लगभग 10 लाख से अधिक जन्तु तथा 3 लाख से अधिक पादप प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इतने असंख्य जीवों को बिना वर्गीकरण के समझना असंभव है। वर्गीकरण के लाभ निम्नलिखित हैं:

  1. जीवों का व्यवस्थित अध्ययन संभव होता है।
  2. जीवों की पहचान सुविधाजनक होती है।
  3. जीवों के बीच विकासवादी संबंधों का पता चलता है।
  4. असंख्य जीवों के बारे में संक्षिप्त ज्ञान प्राप्त होता है।

वर्गीकरण करते समय जीवों की निम्नलिखित विशेषताओं को आधार बनाया जाता है:

  1. कोशिकीय संगठन: कोशिका का प्रकार — प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक।
  2. कोशिकाओं की संख्या: एककोशिकीय या बहुकोशिकीय।
  3. शरीर संगठन: ऊतकों का विकास तथा अंगों की व्यवस्था।
  4. पोषण का तरीका: स्वपोषी (स्वयं भोजन बनाना) या परपोषी (दूसरों पर निर्भर)।

3. पाँच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification)

आर. एच. व्हिटेकर (R. H. Whittaker) ने सन् 1969 में जीवों को पाँच जगतों में वर्गीकृत किया। ये पाँच जगत हैं:

  1. मोनेरा (Monera): इस जगत के सभी जीव प्रोकैरियोटिक होते हैं, अर्थात इनमें स्पष्ट झिल्लीबद्ध नाभिक नहीं होता। ये सामान्यतः एककोशिकीय होते हैं। इनमें झिल्लीबद्ध कोशिकांग नहीं होते। उदाहरण — जीवाणु (Bacteria), नील-हरित शैवाल (Cyanobacteria)। इनकी कोशिका भित्ति होती है।

  2. प्रोटिस्टा (Protista): इस जगत के जीव यूकैरियोटिक तथा प्रायः एककोशिकीय होते हैं। इनमें स्पष्ट नाभिक होता है। ये स्वपोषी या परपोषी दोनों हो सकते हैं। उदाहरण — अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना, डायटम।

  3. कवक (Fungi): इस जगत के जीव यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय (कुछ एककोशिकीय भी, जैसे यीस्ट) होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति काइटिन से बनी होती है। ये मृतजीवी (Saprophytic) होते हैं, अर्थात मृत कार्बनिक पदार्थों पर जीते हैं। ये भोजन अपने शरीर के बाहर ही पचाते हैं तथा अवशोषित करते हैं। उदाहरण — मशरूम, राइज़ोपस (ब्रेड मोल्ड), यीस्ट।

  4. प्लांटी (Plantae): इस जगत के जीव यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय तथा स्वपोषी होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति सेल्यूलोज़ से बनी होती है। इनमें हरितलवक होता है, जिससे ये प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोजन बनाते हैं। उदाहरण — शैवाल, काई, फ़र्न, बीजधारी पौधे।

  5. एनिमेलिया (Animalia): इस जगत के जीव यूकैरियोटिक, बहुकोशिकीय तथा परपोषी (Heterotrophic) होते हैं। इनमें कोशिका भित्ति नहीं होती तथा पोषण अंतर्ग्रहण (ingestion) द्वारा होता है। ये गतिशील होते हैं। उदाहरण — पोरिफेरा से लेकर स्तनधारी तक।

पाँच जगत की तुलना

जगत कोशिका प्रकार कोशिका संख्या पोषण उदाहरण
मोनेरा प्रोकैरियोटिक एककोशिकीय स्वपोषी/परपोषी जीवाणु
प्रोटिस्टा यूकैरियोटिक एककोशिकीय स्वपोषी/परपोषी अमीबा
कवक यूकैरियोटिक बहुकोशिकीय मृतजीवी मशरूम
प्लांटी यूकैरियोटिक बहुकोशिकीय स्वपोषी गुलाब
एनिमेलिया यूकैरियोटिक बहुकोशिकीय परपोषी मनुष्य

4. पादपों का वर्गीकरण (Classification of Plants)

पादपों को उनकी संरचना, विकास तथा विशेषताओं के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है:

थैलोफाइटा (Thallophyta)

यह पादप जगत का सबसे सरल वर्ग है। इन पौधों का शरीर विभेदित नहीं होता — इसमें जड़, तना तथा पत्तियों का विभेदन नहीं पाया जाता। शरीर को थैलस (Thallus) कहते हैं। ये प्रायः आर्द्र स्थानों में पाए जाते हैं। उदाहरण — हरा शैवाल (Spirogyra), समुद्री शैवाल, कवक। इनमें संवहनी ऊतक (जाइलम-फ्लोएम) नहीं होते।

ब्रायोफाइटा (Bryophyta)

इन्हें पादपों का उभयचर कहा जाता है, क्योंकि ये जल तथा स्थल दोनों पर पाए जाते हैं। इनका शरीर विभेदित होता है, परंतु संवहनी ऊतकों का विकास अधूरा होता है। इनमें जल का संवहन सीमित होता है। उदाहरण — मॉस (Moss), लिवरवर्ट (Liverwort)। ये आर्द्र छायादार स्थानों में उगते हैं।

टेरिडोफाइटा (Pteridophyta)

इन पौधों में संवहनी ऊतकों (जाइलम तथा फ्लोएम) का विकास पूर्ण होता है। इनमें जड़, तना तथा पत्तियाँ विभेदित होती हैं। ये बीजों द्वारा प्रजनन नहीं करते; इनमें बीजाणु (Spores) बनते हैं। उदाहरण — फ़र्न (Fern), हॉर्सटेल (Horsetail)। इन्हें प्रथम स्थलीय बीजाणुधारी पौधे कहा जाता है।

जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms)

इन पौधों में नग्न बीज (Naked Seeds) होते हैं — बीज फल के अंदर नहीं बनता। ये सदाबहार वृक्ष होते हैं तथा संवहनी ऊतक पूर्ण विकसित होते हैं। उदाहरण — पाइन (Pine), देवदार (Cedar), साइकस। इनके बीज शंकु (Cone) में पाए जाते हैं।

एंजियोस्पर्म (Angiosperms)

इन पौधों में बीज फल के अंदर बनते हैं, इसलिए इन्हें आवृतबीजी कहते हैं। ये आधुनिक तथा सबसे अधिक विकसित पौधे हैं। एंजियोस्पर्म को बीजपत्रों (Cotyledons) की संख्या के आधार पर दो वर्गों में बाँटा गया है:

  1. एकबीजपत्री (Monocotyledons): इनमें एक बीजपत्र होता है। जड़ें रेशेदार (Fibrous) होती हैं तथा पत्तियों में समानांतर शिराविन्यास होता है। उदाहरण — गेहूँ, धान, मक्का, बाँस।

  2. द्विबीजपत्री (Dicotyledons): इनमें दो बीजपत्र होते हैं। जड़ें मूसला (Tap root) होती हैं तथा पत्तियों में जालिका (Reticulate) शिराविन्यास होता है। उदाहरण — गुलाब, आम, सूरजमुखी, सेम।

पादप वर्गीकरण की तालिका

वर्ग मुख्य विशेषता उदाहरण
थैलोफाइटा अविभेदित शरीर शैवाल, कवक
ब्रायोफाइटा अधूरा संवहन मॉस
टेरिडोफाइटा पूर्ण संवहन, बीजाणु फ़र्न
जिम्नोस्पर्म नग्न बीज पाइन
एंजियोस्पर्म फल में बीज आम, गेहूँ

5. जन्तुओं का वर्गीकरण (Classification of Animals)

जन्तुओं को उनके शरीर की समरूपता, अंगों की व्यवस्था, गुहा (Coelom) की उपस्थिति आदि के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। कुछ प्रमुख संघ निम्नलिखित हैं:

  1. पोरिफेरा (Porifera): इनके शरीर में छिद्र (Pores) होते हैं। ये जलीय, स्थिर (सत्र) होते हैं। उदाहरण — स्पंज (Sponge)।

  2. निडारिया (Cnidaria): इनमें चुभने वाली कोशिकाएँ (Nematocysts) होती हैं। उदाहरण — हाइड्रा, जेलीफ़िश, कोरल।

  3. प्लैटिहेल्मिन्थीज़ (Platyhelminthes): इनका शरीर चपटा होता है, इसलिए इन्हें चपटे कृमि कहते हैं। उदाहरण — लीवर फ्लूक, टेपवर्म (सुअर में पाया जाने वाला परजीवी)।

  4. एनेलिडा (Annelida): इनके शरीर में खंड (Segments) होते हैं। उदाहरण — केंचुआ, जोंक।

  5. आर्थ्रोपोडा (Arthropoda): यह जन्तु जगत का सबसे बड़ा संघ है। इनके शरीर में जोड़दार उपांग तथा बाह्य कंकाल होता है। उदाहरण — कीट (मक्खी, तितली), मकड़ी, केकड़ा, झींगा, बिच्छू।

  6. मोलस्का (Mollusca): इनका शरीर नरम होता है तथा इनमें मांसल पैर (Foot) होता है। कुछ में कवच (Shell) होता है। उदाहरण — घोंघा, सीप, ऑक्टोपस, स्क्विड।

  7. एकाइनोडर्मेटा (Echinodermata): इनके शरीर पर काँटे होते हैं। ये जलीय होते हैं। उदाहरण — स्टारफ़िश, सी अर्चिन।

  8. कॉर्डेटा (Chordata): इनमें नोटोकॉर्ड (Notochord) तथा मेरु रज्जु होती है। कशेरुकी (Vertebrates) इसी के अंतर्गत आते हैं। कशेरुकियों के प्रमुख वर्ग:

6. द्विपद नामकरण (Binomial Nomenclature)

कैरोलस लीनियस द्वारा प्रतिपादित द्विपद नामकरण के अनुसार प्रत्येक जीव का नाम दो शब्दों से मिलकर बनता है — पहला शब्द वंश (Genus) का नाम होता है तथा दूसरा शब्द जाति (Species) का नाम होता है। वंश का नाम बड़े अक्षर से तथा जाति का नाम छोटे अक्षर से लिखा जाता है। जीवों के वैज्ञानिक नाम लैटिन या ग्रीक भाषा में होते हैं तथा इन्हें तिरछे (Italics) अक्षरों में लिखा जाता है। उदाहरण — मनुष्य का वैज्ञानिक नाम Homo sapiens है, जिसमें Homo वंश तथा sapiens जाति है। मक्खी का वैज्ञानिक नाम Musca domestica है। मेंढक का वैज्ञानिक नाम Rana tigrina है। इस विधि से एक जीव को पूरे विश्व में एक ही नाम मिलता है।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: पाँच जगत वर्गीकरण

जगत कोशिका प्रकार पोषण उदाहरण
मोनेरा प्रोकैरियोटिक स्वपोषी/परपोषी जीवाणु
प्रोटिस्टा यूकैरियोटिक एककोशिकीय स्वपोषी/परपोषी अमीबा
कवक यूकैरियोटिक मृतजीवी मशरूम
प्लांटी यूकैरियोटिक स्वपोषी पौधे
एनिमेलिया यूकैरियोटिक परपोषी जन्तु

तालिका 2: पादपों का वर्गीकरण

वर्ग संवहन बीज उदाहरण
थैलोफाइटा नहीं नहीं शैवाल
ब्रायोफाइटा अधूरा नहीं मॉस
टेरिडोफाइटा पूर्ण नहीं (बीजाणु) फ़र्न
जिम्नोस्पर्म पूर्ण नग्न बीज पाइन
एंजियोस्पर्म पूर्ण फल में आम

तालिका 3: प्रमुख संघ

संघ मुख्य विशेषता उदाहरण
आर्थ्रोपोडा जोड़दार उपांग कीट
मोलस्का मांसल पैर घोंघा
एनेलिडा खंडित शरीर केंचुआ
कॉर्डेटा नोटोकॉर्ड मत्स्य, स्तनधारी

माइंड मैप

graph TD A["जीवों में विविधता"] --> B["वर्गीकरण का आधार"] B --> B1["कोशिकीय संगठन"] B --> B2["कोशिका संख्या"] B --> B3["शरीर संगठन"] B --> B4["पोषण"] A --> C["पाँच जगत"] C --> C1["मोनेरा (जीवाणु)"] C --> C2["प्रोटिस्टा (अमीबा)"] C --> C3["कवक (मशरूम)"] C --> C4["प्लांटी (पौधे)"] C --> C5["एनिमेलिया (जन्तु)"] A --> D["पादप वर्गीकरण"] D --> D1["थैलोफाइटा → एंजियोस्पर्म"] A --> E["जन्तु वर्गीकरण"] E --> E1["पोरिफेरा → कॉर्डेटा"] A --> F["द्विपद नामकरण (लीनियस)"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: पाँच जगत वर्गीकरण

पाँच जगत वर्गीकरण (व्हिटेकर) जीव मोनेरा प्रोकैरियोटिक प्रोटिस्टा एककोशिकीय कवक मृतजीवी प्लांटी स्वपोषी एनिमेलिया परपोषी आधार: कोशिका प्रकार (प्रोकैरियोटिक/यूकैरियोटिक) कोशिकाओं की संख्या (एककोशिकीय/बहुकोशिकीय) पोषण (स्वपोषी/परपोषी/मृतजीवी) उदाहरण: जीवाणु, अमीबा, मशरूम, गुलाब, मनुष्य कवक की कोशिका भित्ति: काइटिन | प्लांटी की: सेल्यूलोज़ स्वर्ण नियम केवल मोनेरा में प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ होती हैं; शेष चार जगत यूकैरियोटिक हैं।

आरेख 2: जन्तुओं के संघ तथा कशेरुकियों के वर्ग

जन्तु संघ तथा कशेरुकी वर्ग अकशेरुकी संघ पोरिफेरा - स्पंज निडारिया - हाइड्रा प्लैटिहेल्मिन्थीज़ - टेपवर्म एनेलिडा - केंचुआ आर्थ्रोपोडा - कीट मोलस्का - घोंघा कॉर्डेटा एकाइनोडर्मेटा (स्टारफ़िश) नोटोकॉर्ड + मेरु रज्जु कशेरुकी इसी में कशेरुकी वर्ग मत्स्य - मछली उभयचर - मेंढक सरीसृप - साँप पक्षी - कबूतर स्तनधारी - मनुष्य आर्थ्रोपोडा सबसे बड़ा संघ (जोड़दार उपांग, बाह्य कंकाल) स्तनधारी: बाल, दूध पिलाना, गर्म रक्त द्विपद नामकरण: Homo sapiens (वंश + जाति) - लीनियस Golden Rule वैज्ञानिक नाम में पहला शब्द वंश तथा दूसरा शब्द जाति को दर्शाता है।

सामान्य गलतियाँ

  1. मोनेरा की कोशिका प्रकार: केवल मोनेरा (जीवाणु) में प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ होती हैं; शेष चार जगत यूकैरियोटिक हैं। इसे प्रायः भुला दिया जाता है।
  2. कवक का पोषण: कवक मृतजीवी (Saprophytic) होते हैं और भोजन शरीर के बाहर पचाकर अवशोषित करते हैं; ये पौधों की तरह स्वपोषी नहीं होते। कवक की भित्ति काइटिन की होती है, सेल्यूलोज़ की नहीं।
  3. ब्रायोफाइटा का संवहन: ब्रायोफाइटा में संवहन अधूरा होता है; पूर्ण संवहनी ऊतक टेरिडोफाइटा से प्रारंभ होते हैं।
  4. जिम्नोस्पर्म बनाम एंजियोस्पर्म: जिम्नोस्पर्म में नग्न बीज (बिना फल) होते हैं, एंजियोस्पर्म में बीज फल के भीतर होते हैं। दोनों में भेद स्पष्ट रखें।
  5. मछली बनाम उभयचर: मछलियाँ (मत्स्य) जल में क्लोम द्वारा श्वसन करती हैं, उभयचर (मेंढक) जल एवं स्थल दोनों पर जीते हैं। उभयचरों की त्वचा नम होती है।
  6. वैज्ञानिक नाम में प्रथम शब्द: द्विपद नाम का पहला शब्द वंश (Genus) होता है तथा दूसरा जाति (Species); इसे प्रायः उल्टा कर लिया जाता है। वंश का नाम बड़े अक्षर से लिखा जाता है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. पाँच जगत वर्गीकरण की तालिका (जगत, कोशिका प्रकार, पोषण, उदाहरण) याद करें — यह सबसे महत्वपूर्ण विषय है।
  2. प्रत्येक जगत तथा संघ के एक-एक प्रतिनिधि जीव का नाम अवश्य याद रखें।
  3. पादप वर्गीकरण के पाँचों वर्गों को क्रमशः (थैलोफाइटा → एंजियोस्पर्म) संवहन तथा बीज के आधार पर अंतर सहित याद करें।
  4. कशेरुकियों के पाँच वर्गों (मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी, स्तनधारी) की प्रमुख विशेषताएँ तथा उदाहरण लिखने का अभ्यास करें।
  5. एकबीजपत्री एवं द्विबीजपत्री में अंतर (बीजपत्र, जड़ें, शिराविन्यास) याद रखें।
  6. द्विपद नामकरण के नियम (वंश + जाति, तिरछा अक्षर, बड़ा-छोटा अक्षर) लिखने का अभ्यास करें तथा तीन वैज्ञानिक नाम (Homo sapiens, Musca domestica, Rana tigrina) याद रखें।

निष्कर्ष

इस अध्याय में हमने सीखा कि जीवों में पाई जाने वाली विविधता को वर्गीकरण के द्वारा सुव्यवस्थित किया जाता है। वर्गीकरण का आधार कोशिकीय संगठन, कोशिकाओं की संख्या, शरीर संगठन तथा पोषण की विधि है। व्हिटेकर ने जीवों को पाँच जगतों में बाँटा — मोनेरा (प्रोकैरियोटिक, जीवाणु), प्रोटिस्टा (एककोशिकीय यूकैरियोटिक, अमीबा), कवक (मृतजीवी, मशरूम), प्लांटी (स्वपोषी) तथा एनिमेलिया (परपोषी)। पादपों को थैलोफाइटा, ब्रायोफाइटा, टेरिडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म तथा एंजियोस्पर्म में वर्गीकृत किया गया है। जन्तुओं को पोरिफेरा, निडारिया, प्लैटिहेल्मिन्थीज़, एनेलिडा, आर्थ्रोपोडा, मोलस्का, एकाइनोडर्मेटा तथा कॉर्डेटा संघों में बाँटा गया है। कशेरुकियों में मत्स्य, उभयचर, सरीसृप, पक्षी तथा स्तनधारी वर्ग शामिल हैं। लीनियस द्वारा प्रतिपादित द्विपद नामकरण में प्रत्येक जीव को वंश तथा जाति के आधार पर अद्वितीय वैज्ञानिक नाम मिलता है। यह वर्गीकरण जीवों के बीच विकासवादी संबंधों को समझने तथा उनके व्यवस्थित अध्ययन की नींव है।