बढ़ती जनसंख्या के साथ खाद्य की माँग भी बढ़ती जा रही है। हमारे देश में लाखों किसान प्रतिवर्ष अनाज, सब्जियाँ, फल, दूध, अंडे तथा मछली उत्पादित करते हैं। परंतु उत्पादन के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता तथा वृद्धि भी आवश्यक है। इस अध्याय में हम फसल उत्पादन में सुधार, पशुपालन, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन के तरीकों का अध्ययन करेंगे। ये सभी विधियाँ हमारे खाद्य संसाधनों (Food Resources) में सुधार करती हैं।
फसल (Crop): एक ही प्रकार के पौधे जिन्हें बड़ी मात्रा में एक साथ उगाया जाता है, फसल कहलाते हैं। फसलें मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं — खाद्यान्न फसलें (गेहूँ, धान, मक्का), दलहन (मटर, चना, मसूर) तथा तिलहन (मूंगफली, सरसों, तिल)। इसके अतिरिक्त सब्जियाँ तथा फल भी फसलें हैं। भारत में फसलें मुख्यतः तीन ऋतुओं में उगाई जाती हैं — खरीफ (Kharif), रबी (Rabi) तथा ज़ायद (Zaid)। खरीफ फसलें वर्षा ऋतु (जून-अक्टूबर) में उगाई जाती हैं, जैसे धान, मक्का, ज्वार, बाजरा। रबी फसलें शीत ऋतु (अक्टूबर-मार्च) में उगाई जाती हैं, जैसे गेहूँ, चना, सरसों, मटर। ज़ायद फसलें ग्रीष्म ऋतु में उगाई जाती हैं, जैसे तरबूज़, खीरा।
भारत एक कृषि प्रधान देश है। लगभग 70% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। खाद्य संसाधनों में सुधार के लिए वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करना आवश्यक है — उन्नत बीज, उचित सिंचाई, उर्वरक, कीट प्रबंधन तथा फसल चक्र। इस अध्याय के अंत तक हम जानेंगे कि फसल उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए तथा पशुधन से अधिकतम उत्पादन कैसे प्राप्त किया जाए।
फसल उत्पादन की कृषि प्रणाली में तीन मुख्य चरण हैं — कृषि क्रियाएँ (खेती), फसल सुधार (बेहतर प्रजातियाँ) तथा फसल सुरक्षा (कीट-रोगों से)। फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती हैं:
पौधों की किस्मों में सुधार (Crop Variety Improvement): बेहतर किस्मों के विकास से अधिक उपज प्राप्त होती है। किस्मों में सुधार के लक्ष्य हैं — अधिक उपज, बेहतर गुणवत्ता, रोग तथा कीट प्रतिरोधकता, जलवायु सहनशीलता (सूखा, जलभराव, ठंड, गर्मी) तथा जल-उपयोग क्षमता। उन्नत किस्में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानों तथा कृषि विश्वविद्यालयों में विकसित की जाती हैं। हरित क्रांति (Green Revolution) के अंतर्गत गेहूँ तथा धान की उन्नत किस्मों के विकास से भारत का खाद्य उत्पादन कई गुना बढ़ा।
संकरण (Hybridization): दो भिन्न किस्मों के पौधों का पर-परागण कराकर बेहतर संकर (Hybrid) किस्में प्राप्त करना संकरण कहलाता है। संकर किस्मों में माता-पिता दोनों की अच्छी विशेषताएँ आती हैं। जीन अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) द्वारा भी पौधों में वांछित जीन स्थानांतरित किए जाते हैं।
उर्वरक तथा सिंचाई (Fertilizers and Irrigation): मृदा में पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए उर्वरकों का उपयोग होता है। उर्वरकों में नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटैशियम प्रमुख हैं। जैविक खाद (गोबर, कम्पोस्ट) मृदा की संरचना सुधारती है तथा सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देती है। रासायनिक उर्वरक तत्काल पोषक तत्व देते हैं, परंतु अत्यधिक उपयोग मृदा को हानि पहुँचाता है। फसलों को पर्याप्त जल देने के लिए सिंचाई आवश्यक है। सिंचाई की विधियाँ — नहर, कुआँ, बौछार (स्प्रिंकलर) तथा टपक (ड्रिप) सिंचाई। टपक सिंचाई में जल की बचत अधिक होती है।
फसलों को कीट, रोग तथा खरपतवार से सुरक्षा की आवश्यकता होती है। कुछ प्रमुख पदार्थ:
खरपतवार (Weeds) वे अवांछित पौधे हैं, जो फसलों के साथ पानी, पोषक तत्व तथा प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। खरपतवारों को हाथ से निराई (weeding) करके या शाकनाशियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। फसल चक्र (Crop Rotation) — एक ही भूमि पर बारी-बारी से विभिन्न फसलें उगाना — मृदा की उर्वरता बनाए रखता है। फलीदार फसल (दलहन) के बाद अनाज उगाने से मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, क्योंकि दलहन की जड़ों में राइज़ोबियम नाइट्रोजन स्थिर करता है।
कटाई के बाद अनाज को सुरक्षित रखना आवश्यक है। नमी तथा जीव (कीट, कवक, जीवाणु) अनाज को नष्ट कर सकते हैं। अनाज के भंडारण के लिए बड़े भंडारगृह (Silos, Granaries) तथा सिलो बनाए जाते हैं। भंडारण से पहले अनाज को सुखाकर साफ किया जाता है। कीटों से सुरक्षा के लिए उचित कीटनाशकों का प्रयोग होता है। सरकारी एजेंसियाँ (FCI) किसानों से अनाज खरीदकर भंडारगृहों में संग्रहीत करती हैं तथा आवश्यकता के समय वितरित करती हैं।
पशुपालन पशुओं की देखभाल, प्रजनन तथा उनसे उत्पादन प्राप्त करने की विज्ञान है। पशुओं से हमें दूध, अंडे, मांस, ऊन तथा चमड़ा मिलता है। पशुपालन के मुख्य क्षेत्र:
दुग्ध उत्पादन (Dairy): गाय, भैंस तथा बकरी से दूध प्राप्त होता है। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छी नस्लों (जैसे साहीवाल, गिर, जर्सी) तथा उचित पोषण आवश्यक है। दुधारू पशुओं के लिए संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, समुचित रहने की जगह तथा रोगों से सुरक्षा (टीकाकरण) आवश्यक है। श्वेत क्रांति (White Revolution) ने भारत को दूध उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया।
पशुओं का पोषण: पशुओं का आहार दो भागों में होता है — मोटा चारा (हरा चारा, भूसा) जो ऊर्जा देता है, तथा गाढ़ा चारा (अनाज, तेल खली, चोकर) जो प्रोटीन तथा विटामिन देता है। स्वस्थ पशुओं के लिए संतुलित आहार तथा स्वच्छ जल आवश्यक है।
रोग प्रबंधन: पशुओं में होने वाले रोग (जैसे खुर-मुँह रोग, क्षय रोग, एन्थ्रेक्स) से बचाव के लिए टीकाकरण तथा नियमित पशु चिकित्सा देखभाल आवश्यक है।
मुर्गीपालन में मुर्गियाँ तथा बत्तखों का पालन किया जाता है, जिनसे अंडे तथा मांस प्राप्त होता है। मुर्गीपालन के लाभ:
मुर्गीपालन के लिए अच्छी नस्लों (जैसे व्हाइट लेगहॉर्न, ब्राउन कॉर्निश), उचित आहार, स्वच्छ वातावरण तथा रोग नियंत्रण आवश्यक है। आधुनिक मुर्गीपालन में अंडे देने वाली तथा मांस के लिए पाली जाने वाली अलग-अलग नस्लें होती हैं। मुर्गियों को विटामिन तथा खनिज युक्त संतुलित आहार दिया जाता है। मुर्गियों के प्रमुख रोग — मारेक रोग, रानीखेत रोग — के लिए टीकाकरण किया जाता है।
मत्स्य पालन से मछली तथा समुद्री खाद्य उत्पाद प्राप्त होते हैं। मछली प्रोटीन तथा ओमेगा-3 वसा का अच्छा स्रोत है। मत्स्य पालन के प्रकार:
अंतर्देशीय मत्स्य पालन (Inland Fisheries): नदियों, तालाबों, झीलों तथा मत्स्य बीज तालाबों में मछली पालन। कार्प (कतला, रोहू, मृगल) भारत की प्रमुख अंतर्देशीय मछलियाँ हैं।
समुद्री मत्स्य पालन (Marine Fisheries): समुद्र तथा महासागरों से मछली पकड़ना। बॉम्बे डक, सारडीन, हिलसा समुद्री मछलियाँ हैं। समुद्री मछलियों के अतिरिक्त झींगा तथा केकड़ा भी पकड़े जाते हैं।
मछली को अच्छी गुणवत्ता का आहार, स्वच्छ जल तथा उचित घनत्व में पाला जाता है। मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्नत नस्लों तथा वैज्ञानिक प्रबंधन का उपयोग होता है।
मधुमक्खी पालन (Apiculture) में मधुमक्खियों को विशेष बक्सों (हाइव) में पाला जाता है, जिनसे शहद (Honey) तथा मोम (Wax) प्राप्त होता है। मधुमक्खियाँ फूलों से मकरंद (Nectar) एकत्र करती हैं और उसे शहद में बदलती हैं। शहद पौष्टिक तथा औषधीय गुणों से युक्त होता है। मधुमक्खी पालन में ध्यान रखने योग्य बातें:
मधुमक्खी पालन से किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है तथा मधुमक्खियाँ पर-परागण में सहायक होकर फलों तथा सब्जियों के उत्पादन को बढ़ाती हैं।
| ऋतु | फसलें | उदाहरण |
|---|---|---|
| खरीफ | वर्षा ऋतु (जून-अक्टूबर) | धान, मक्का, ज्वार |
| रबी | शीत ऋतु (अक्टूबर-मार्च) | गेहूँ, चना, सरसों |
| ज़ायद | ग्रीष्म ऋतु | तरबूज़, खीरा |
| विधि | उद्देश्य |
|---|---|
| किस्म सुधार | अधिक उपज, रोग प्रतिरोधकता |
| संकरण | बेहतर संकर किस्में |
| उर्वरक | पोषक तत्वों की आपूर्ति |
| फसल चक्र | मृदा की उर्वरता बनाए रखना |
| खरपतवार नियंत्रण | प्रतिस्पर्धा कम |
| क्षेत्र | उत्पाद | प्रमुख जन्तु |
|---|---|---|
| दुग्ध उत्पादन | दूध | गाय, भैंस, बकरी |
| मुर्गीपालन | अंडे, मांस | मुर्गी, बत्तख |
| मत्स्य पालन | मछली | कार्प, झींगा |
| मधुमक्खी पालन | शहद, मोम | मधुमक्खी |
इस अध्याय में हमने सीखा कि बढ़ती जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खाद्य संसाधनों में सुधार आवश्यक है। फसल उत्पादन में सुधार के लिए किस्म सुधार, संकरण, उर्वरक, सिंचाई, कीट-रोग नियंत्रण तथा फसल चक्र जैसी वैज्ञानिक विधियाँ उपयोग की जाती हैं। हरित क्रांति से भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना। पशुपालन से दूध, अंडे, मांस तथा ऊन प्राप्त होता है; श्वेत क्रांति ने दुग्ध उत्पादन बढ़ाया। मुर्गीपालन से प्रोटीन युक्त अंडे तथा मांस मिलते हैं। मत्स्य पालन मछली प्रोटीन का स्रोत है, जो अंतर्देशीय तथा समुद्री दोनों क्षेत्रों में होता है। मधुमक्खी पालन से शहद तथा मोम मिलता है, साथ ही यह पर-परागण में सहायक होकर फल उत्पादन बढ़ाता है। उन्नत नस्लें, संतुलित पोषण तथा रोग नियंत्रण इन सभी क्षेत्रों की सफलता का आधार हैं। इस प्रकार खाद्य संसाधनों में सुधार किसानों की आय, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा तथा पोषण के लिए महत्वपूर्ण है।