संसार की समस्त वस्तुएँ — हवा, जल, पत्थर, पौधे, जन्तु, बादल, तारे तथा यहाँ तक कि हमारा अपना शरीर भी — किसी न किसी पदार्थ से बना है। जिस सामग्री से सभी वस्तुएँ बनी होती हैं, उसे विज्ञान की भाषा में पदार्थ (Matter) कहते हैं। पदार्थ कोई एक वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक अवधारणा है, जो स्थान घेरने वाली तथा द्रव्यमान रखने वाली हर चीज़ को सम्मिलित करती है। वैज्ञानिकों का मत है कि पदार्थ का निर्माण अत्यंत सूक्ष्म कणों से होता है, और ये कण निरंतर गति करते रहते हैं। इस अध्याय में हम पदार्थ की भौतिक प्रकृति, उसकी विभिन्न अवस्थाओं, अवस्था परिवर्तन, गुप्त ऊष्मा तथा वाष्पीकरण का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
पदार्थ के स्वरूप को समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि पदार्थ कणों से मिलकर बना है। प्राचीन काल में यूनानी दार्शनिकों का मानना था कि पदार्थ निरंतर (continuous) है, परंतु आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो गया है कि पदार्थ कणों से बना है। जब हम एक चम्मच चीनी को पानी में घोलते हैं, तो चीनी विलीन हो जाती है, परंतु पानी मीठा बना रहता है। इसका अर्थ है कि चीनी के सूक्ष्म कण पानी के कणों के बीच के रिक्त स्थानों में फैल गए हैं। पोटैशियम परमैंगनेट के एक क्रिस्टल को बड़े टैंक में घोलने पर भी पूरा पानी रंगीन हो जाता है, जो दर्शाता है कि पदार्थ के कण अत्यंत सूक्ष्म होते हैं तथा उनके बीच पर्याप्त रिक्त स्थान होता है।
पदार्थ के कणों में तीन विशेष लक्षण देखे जाते हैं — कणों के बीच रिक्त स्थान, कणों की निरंतर गति तथा कणों के बीच परस्पर आकर्षण बल। इन्हीं लक्षणों के कारण पदार्थ की भौतिक अवस्था निर्धारित होती है। तापमान और दाब में परिवर्तन करके हम किसी पदार्थ की अवस्था को बदल सकते हैं। इस अध्याय में हम इन सभी अवधारणाओं को उदाहरणों सहित समझेंगे, क्योंकि यही वह आधार है जिस पर रसायन विज्ञान की संपूर्ण संरचना खड़ी है।
पदार्थ की भौतिक प्रकृति के बारे में प्राचीन काल से दो विचारधाराएँ प्रचलित थीं। पहली विचारधारा के अनुसार पदार्थ लकड़ी की तरह सतत (continuous) होता है, अर्थात उसे बार-बार काटने पर भी सूक्ष्मतम अविभाज्य टुकड़ा प्राप्त नहीं होता। दूसरी विचारधारा के अनुसार पदार्थ रेत के कणों की तरह अत्यंत सूक्ष्म अविभाज्य कणों से मिलकर बना होता है। आधुनिक विज्ञान ने दूसरी विचारधारा को सत्य सिद्ध किया है।
कणों के बीच रिक्त स्थान: विभिन्न प्रयोगों से यह सिद्ध होता है कि पदार्थ के कणों के बीच पर्याप्त रिक्त स्थान होता है। जब हम एक गिलास पानी में चीनी घोलते हैं, तो पानी का आयतन नहीं बढ़ता, क्योंकि चीनी के कण पानी के कणों के बीच के रिक्त स्थान में समा जाते हैं। इसी प्रकार पोटैशियम परमैंगनेट के क्रिस्टल को पानी में घोलने पर पूरा पानी रंगीन हो जाता है, परंतु आयतन में वृद्धि नहीं होती। यह प्रमाण है कि कणों के बीच रिक्त स्थान विद्यमान है।
कणों की निरंतर गति: पदार्थ के कण कभी स्थिर नहीं रहते; वे निरंतर गतिशील रहते हैं। किसी पदार्थ के कणों का स्वतः ही दूसरे पदार्थ के कणों में मिल जाना विसरण (Diffusion) कहलाता है। जब हम कमरे में इत्र की बोतल खोलते हैं, तो उसकी सुगंध कुछ ही समय में पूरे कमरे में फैल जाती है। इसी प्रकार गरम चाय में चीनी का विसरण ठंडे पानी की तुलना में अधिक तीव्र होता है, क्योंकि तापमान बढ़ने पर कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ जाती है। यही कारण है कि गरम दूध में चीनी अधिक शीघ्रता से घुलती है।
कणों के बीच आकर्षण बल: पदार्थ के कणों के बीच एक बल कार्य करता है, जो उन्हें परस्पर बाँधे रखता है। इस बल को अंतराणुक आकर्षण बल कहते हैं। विभिन्न पदार्थों में इस आकर्षण बल का सामर्थ्य भिन्न-भिन्न होता है। लोहे की कील को तोड़ना कठिन है, जबकि चाक का टुकड़ा आसानी से टूट जाता है; इसका कारण है कि लोहे के कणों के बीच आकर्षण बल अधिक तीव्र होता है। गैसों में यह बल न्यूनतम होता है, इसलिए गैसें स्वतंत्र रूप से फैलती हैं।
भौतिक गुणों के आधार पर पदार्थ की तीन मुख्य अवस्थाएँ होती हैं — ठोस, द्रव और गैस। इन तीनों अवस्थाओं में कणों की व्यवस्था, उनके बीच की दूरी तथा आकर्षण बल में स्पष्ट अंतर पाया जाता है।
ठोस (Solid): ठोस पदार्थों में कण अत्यंत निकट होते हैं तथा उनके बीच आकर्षण बल अत्यधिक होता है। कण केवल अपने स्थान के चारों ओर कंपन करते हैं। ठोस का निश्चित आकार, निश्चित आयतन तथा निश्चित घनत्व होता है। इन्हें दबाना कठिन होता है। उदाहरण — लकड़ी, लोहा, बर्फ, पत्थर। ठोस संपीड्यता केवल नगण्य होती है।
द्रव (Liquid): द्रवों में कणों के बीच की दूरी ठोस से अधिक होती है, परंतु आकर्षण बल अभी भी पर्याप्त होता है। द्रव का कोई निश्चित आकार नहीं होता, वह उस बर्तन का आकार धारण कर लेता है जिसमें उसे रखा जाता है, परंतु उसका आयतन निश्चित रहता है। द्रव में बहाव होता है, इसलिए उनका आकार बदलता रहता है। उदाहरण — जल, दूध, तेल। द्रव की संपीड्यता बहुत कम होती है।
गैस (Gas): गैसों में कणों के बीच की दूरी अत्यधिक होती है तथा आकर्षण बल नगण्य होता है। गैस का न तो निश्चित आकार होता है और न ही निश्चित आयतन। गैस के कण पूरे बर्तन में स्वतंत्र रूप से फैल जाते हैं। गैसों को आसानी से संपीडित किया जा सकता है। यही कारण है कि एलपीजी (LPG) गैस को दाब द्वारा द्रवित करके सिलेंडर में भरा जाता है तथा सीएनजी (CNG) को वाहनों में उच्च दाब पर संग्रहीत किया जाता है।
नीचे दी गई तालिका में ठोस, द्रव और गैस की तुलना की गई है:
| गुणधर्म | ठोस (Solid) | द्रव (Liquid) | गैस (Gas) |
|---|---|---|---|
| आकार | निश्चित | अनिश्चित | अनिश्चित |
| आयतन | निश्चित | निश्चित | अनिश्चित |
| कणों के बीच आकर्षण | अधिकतम | मध्यम | न्यूनतम |
| कणों की गति | केवल कंपन | मुक्त गति | अत्यधिक मुक्त गति |
| संपीड्यता | नगण्य | बहुत कम | अधिक |
| घनत्व | उच्च | मध्यम | निम्न |
तापमान और दाब में परिवर्तन करके किसी पदार्थ की एक अवस्था को दूसरी अवस्था में बदला जा सकता है। तापमान में वृद्धि करने पर कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है, जिससे ठोस द्रव में तथा द्रव गैस में परिवर्तित हो जाता है।
गलन (Fusion/Melting): ठोस का द्रव में परिवर्तित होना गलन कहलाता है। जिस तापमान पर ठोस पिघलकर द्रव बन जाता है, उसे गलनांक (Melting Point) कहते हैं। सामान्य वायुमंडलीय दाब पर बर्फ का गलनांक 0°C या 273.15 K होता है।
क्वथन (Boiling): द्रव का गैस में परिवर्तित होना क्वथन कहलाता है। जिस तापमान पर द्रव उबलने लगता है, उसे क्वथनांक (Boiling Point) कहते हैं। सामान्य वायुमंडलीय दाब पर जल का क्वथनांक 100°C या 373 K होता है।
ऊर्ध्वपातन (Sublimation): कुछ पदार्थ द्रव अवस्था से गुजरे बिना सीधे ठोस से गैस तथा गैस से ठोस में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को ऊर्ध्वपातन कहते हैं। कपूर (कर्पूर), नेफ्थलीन बॉल, अमोनियम क्लोराइड तथा शुष्क बर्फ इसके प्रमुख उदाहरण हैं। शुष्क बर्फ ठोस कार्बन डाइऑक्साइड है, जो द्रव में बदले बिना सीधे गैस में परिवर्तित हो जाती है, इसीलिए इसे शुष्क (सूखी) बर्फ कहा जाता है।
गैस से द्रव (संघनन): गैस को ठंडा करने तथा दाब बढ़ाने पर वह द्रव में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रक्रिया को संघनन (Condensation) कहते हैं। वायुमंडलीय दाब पर गैसों का क्वथनांक अत्यंत कम होता है, इसलिए उन्हें द्रवित करने के लिए कम तापमान तथा अधिक दाब की आवश्यकता होती है। एलपीजी सिलेंडर में गैस को दाब द्वारा द्रवित करके भरा जाता है।
अवस्था परिवर्तन के समय तापमान स्थिर रहता है, यद्यपि ऊष्मा की आपूर्ति निरंतर होती रहती है। इस ऊष्मा का उपयोग कणों के बीच के आकर्षण बल को तोड़ने में होता है, इसलिए तापमान में कोई वृद्धि नहीं होती। यह ऊष्मा पदार्थ में गुप्त (hidden) रहती है, अतः इसे गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) कहते हैं।
संगलन की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Fusion): किसी ठोस को उसके गलनांक पर पूर्णतः द्रव में बदलने के लिए प्रति इकाई द्रव्यमान पर आवश्यक ऊष्मा को संगलन की गुप्त ऊष्मा कहते हैं। बर्फ के लिए इसका मान लगभग 3.34 × 10^5 J/kg होता है। जब 1 kg बर्फ पिघलती है, तो 3.34 × 10^5 J ऊर्जा अवशोषित होती है, बिना तापमान बदले।
वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा (Latent Heat of Vaporization): किसी द्रव को उसके क्वथनांक पर पूर्णतः गैस में बदलने के लिए प्रति इकाई द्रव्यमान पर आवश्यक ऊष्मा को वाष्पीकरण की गुप्त ऊष्मा कहते हैं। जल के लिए इसका मान लगभग 22.6 × 10^5 J/kg होता है। यही कारण है कि भाप से होने वाली जलन उबलते जल की जलन से अधिक गंभीर होती है, क्योंकि भाप में गुप्त ऊष्मा निहित रहती है।
तापमान बढ़ाने से कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है और पदार्थ ठोस से द्रव तथा द्रव से गैस की ओर अग्रसर होता है। इसके विपरीत तापमान घटाने और दाब बढ़ाने पर गैस द्रव में तथा द्रव ठोस में परिवर्तित हो जाता है। इसीलिए हम कहते हैं कि अवस्था का निर्धारण तापमान तथा दाब दोनों पर निर्भर करता है। वायुमंडलीय दाब बढ़ने पर द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है। पर्वतों की चोटी पर दाब कम होता है, इसलिए जल कम तापमान पर ही उबल जाता है और खाना पकाने में अधिक समय लगता है। प्रेशर कुकर में दाब अधिक होता है, इसलिए भोजन शीघ्र पक जाता है।
जब किसी द्रव की सतह के कणों को पर्याप्त गतिज ऊर्जा प्राप्त होती है, तो वे क्वथनांक से कम तापमान पर ही द्रव की सतह से वाष्प के रूप में उड़ जाते हैं। इस प्रक्रिया को वाष्पीकरण (Evaporation) कहते हैं। वाष्पीकरण क्वथनांक से कम तापमान पर, केवल सतह पर, किसी भी तापमान पर तथा धीरे-धीरे होता है, जबकि क्वथन में द्रव का संपूर्ण आयतन भाग लेता है तथा तापमान क्वथनांक तक पहुँचना आवश्यक होता है।
सतह का क्षेत्रफल: द्रव की सतह का क्षेत्रफल बढ़ने पर वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है। यही कारण है कि गीले कपड़ों को फैलाकर सुखाया जाता है, जिससे अधिक सतह खुलने पर पानी शीघ्र वाष्पित हो जाता है।
तापमान: तापमान बढ़ने पर कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है, जिससे वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है। गर्मी के दिनों में कपड़े शीघ्र सूखते हैं।
आर्द्रता: वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता (Humidity) कहते हैं। आर्द्रता अधिक होने पर वायु में अधिक जलवाष्प पहले से मौजूद होता है, जिससे वाष्पीकरण की दर घट जाती है। बरसात के मौसम में कपड़े धीरे सूखते हैं।
वायु की गति: वायु की गति बढ़ने पर द्रव की सतह से उठे वाष्प कण उड़ जाते हैं, जिससे वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है। तेज़ हवा वाले दिन कपड़े शीघ्र सूखते हैं।
वाष्पीकरण के दौरान द्रव के कण अपने आस-पास के वातावरण से ऊष्मा अवशोषित करते हैं। इस ऊष्मा के अवशोषण से आस-पास का वातावरण ठंडा हो जाता है। यही कारण है कि:
हथेली पर एसीटोन या पेट्रोल डालने पर ठंडक महसूस होती है, क्योंकि इनके तीव्र वाष्पीकरण से हथेली से ऊष्मा अवशोषित होती है।
गर्मियों में सूती कपड़े पहनने से ठंडक मिलती है, क्योंकि सूती कपड़े पसीने को सोख लेते हैं तथा पसीने के वाष्पीकरण से शरीर ठंडा होता है।
कुलर में हवा तथा पानी का वाष्पीकरण शीतलन उत्पन्न करता है।
चाय पीने के लिए उसमें फूँक मारी जाती है, ताकि वाष्पीकरण बढ़कर चाय ठंडी हो सके।
दरवाज़ों पर पानी छिड़कने से दरवाज़ा ठंडा हो जाता है, क्योंकि पानी के वाष्पीकरण से दरवाज़े से ऊष्मा अवशोषित होती है।
| संक्रमण | प्रक्रिया का नाम | ऊष्मा का प्रभाव |
|---|---|---|
| ठोस → द्रव | गलन (संगलन) | ऊष्मा अवशोषण (गुप्त ऊष्मा) |
| द्रव → गैस | क्वथन / वाष्पीकरण | ऊष्मा अवशोषण |
| गैस → द्रव | संघनन | ऊष्मा निष्कासन |
| द्रव → ठोस | जमना / हिमीकरण | ऊष्मा निष्कासन |
| ठोस → गैस | ऊर्ध्वपातन | ऊष्मा अवशोषण |
| गैस → ठोस | निक्षेपण | ऊष्मा निष्कासन |
| गुण | वाष्पीकरण | क्वथन |
|---|---|---|
| तापमान | क्वथनांक से कम | क्वथनांक पर |
| स्थान | केवल सतह पर | संपूर्ण द्रव में |
| दर | धीमी | तीव्र |
| तापमान प्रभाव | किसी भी तापमान पर | केवल विशिष्ट तापमान पर |
| गुप्त ऊष्मा | नगण्य | महत्वपूर्ण |
| पदार्थ | गलनांक | क्वथनांक |
|---|---|---|
| जल | 273.15 K (0°C) | 373 K (100°C) |
| बर्फ | 0°C | — |
| ठोस CO2 (शुष्क बर्फ) | -78°C (ऊर्ध्वपातन) | — |
इस अध्याय में हमने सीखा कि पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है, जो निरंतर गतिशील रहते हैं तथा जिनके बीच रिक्त स्थान और आकर्षण बल होता है। पदार्थ की तीन अवस्थाएँ — ठोस, द्रव और गैस — कणों की व्यवस्था एवं आकर्षण बल में भिन्न होती हैं। तापमान और दाब में परिवर्तन करके पदार्थ की अवस्था बदली जा सकती है; गलन, क्वथन, संघनन, जमना तथा ऊर्ध्वपातन अवस्था परिवर्तन की प्रक्रियाएँ हैं। अवस्था परिवर्तन के समय ऊष्मा का उपयोग कणों के आकर्षण बल को तोड़ने में होता है, अतः यह गुप्त ऊष्मा के रूप में संग्रहीत रहती है और तापमान स्थिर रहता है। वाष्पीकरण क्वथनांक से कम तापमान पर द्रव की सतह से होने वाला मंद वाष्पीकरण है, जो सतह क्षेत्रफल, तापमान, आर्द्रता और वायु की गति से प्रभावित होता है। वाष्पीकरण के कारण शीतलन प्रभाव उत्पन्न होता है, जिसका उपयोग दैनिक जीवन में सूती वस्त्र, कुलर, दवाओं आदि में होता है। यह अध्याय रसायन विज्ञान की नींव है, क्योंकि पदार्थ की प्रकृति को समझे बिना रासायनिक अभिक्रियाओं को नहीं समझा जा सकता।