पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व किन मूल तत्वों पर निर्भर करता है? वायु, जल, मृदा तथा सूर्य का प्रकाश — ये चार तत्व ही पृथ्वी पर जीवन का आधार हैं। इन सबको सामूहिक रूप से प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources) कहते हैं। ये संसाधन प्रकृति द्वारा प्रदान किए जाते हैं तथा इनके बिना जीवन संभव नहीं है। इस अध्याय में हम वायु, जल, मृदा और जैव संसाधनों तथा उनसे जुड़े विभिन्न चक्रों (कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, ऑक्सीजन चक्र, जल चक्र) का अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी का वातावरण गैसों का एक पतला आवरण है, जिसमें नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%) तथा कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, जलवाष्प आदि न्यून मात्रा में होते हैं। यह वातावरण पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाता है तथा जीवन के लिए अनुकूल तापमान बनाए रखता है। वायु में ऑक्सीजन श्वसन के लिए, कार्बन डाइऑक्साइड प्रकाश संश्लेषण के लिए तथा नाइट्रोजन जीवों के लिए आवश्यक है। वायु का दाब वायुमंडल का महत्वपूर्ण घटक है, जो जीवन की क्रियाओं को प्रभावित करता है।
प्राकृतिक संसाधनों में जैव संसाधन (Biotic Resources) तथा अजैव संसाधन (Abiotic Resources) दोनों शामिल हैं। वायु, जल, मृदा, खनिज अजैव संसाधन हैं, जबकि पौधे, जन्तु तथा सूक्ष्मजीव जैव संसाधन हैं। प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बनाए रखने के लिए उनके चक्र (Cycles) महत्वपूर्ण हैं। पृथ्वी के तापमान, वर्षा, मौसम तथा मृदा की उर्वरता इन्हीं चक्रों पर निर्भर करते हैं। मानव की अंधाधुंध गतिविधियाँ इन संसाधनों को प्रदूषित कर रही हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन को खतरा उत्पन्न हो रहा है। इस अध्याय में हम इन संसाधनों के महत्व तथा उनके संरक्षण का अध्ययन करेंगे।
पृथ्वी के चारों ओर गैसों का आवरण वायुमंडल (Atmosphere) कहलाता है। वायुमंडल का महत्व निम्नलिखित है:
वायु का प्रदूषण — धुआँ, जहरीली गैसें, धूल तथा रासायनिक उत्सर्जन वायु को प्रदूषित करते हैं। इससे ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) बढ़ता है। कार्बन डाइऑक्साइड तथा मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी के तापमान को बढ़ाती हैं, जिसे वैश्विक ऊष्मन (Global Warming) कहते हैं। वैश्विक ऊष्मन से बर्फ पिघलना, समुद्र स्तर में वृद्धि तथा जलवायु परिवर्तन होते हैं।
कार्बन पृथ्वी पर वायुमंडल (कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में), जल, मृदा तथा जीवों के शरीर में विभिन्न रूपों में पाया जाता है। कार्बन का वायुमंडल तथा जीवों के बीच निरंतर आदान-प्रदान होता रहता है, जिसे कार्बन चक्र कहते हैं।
कार्बन चक्र के संतुलन से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा स्थिर रहती है। जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक दहन से यह संतुलन बिगड़ता है, जिससे वैश्विक ऊष्मन बढ़ता है।
वायुमंडल में नाइट्रोजन लगभग 78% है, परंतु प्रत्यक्ष रूप में जीव इसे ग्रहण नहीं कर सकते। नाइट्रोजन का वायुमंडल तथा जीवों के बीच आदान-प्रदान नाइट्रोजन चक्र कहलाता है। इसके मुख्य चरण हैं:
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): वायुमंडलीय नाइट्रोजन को जीवों द्वारा उपयोगी नाइट्रोजन यौगिकों (नाइट्रेट) में बदलना। यह कार्य मृदा में पाए जाने वाले राइज़ोबियम जैसे जीवाणुओं तथा विद्युत निर्वहन (बिजली गिरने) द्वारा होता है। फलीदार पौधों (मटर, चना, बीन्स) की जड़ों में राइज़ोबियम जीवाणु रहते हैं।
अमोनीकरण (Ammonification): मृत जीवों के अपघटन से नाइट्रोजन युक्त कार्बनिक पदार्थ अमोनिया में बदलते हैं।
नाइट्रिफिकेशन (Nitrification): अमोनिया जीवाणुओं द्वारा नाइट्राइट तथा फिर नाइट्रेट में परिवर्तित होती है, जिसे पौधे ग्रहण करते हैं।
विनाइट्रीकरण (Denitrification): कुछ जीवाणु नाइट्रेट को पुनः वायुमंडलीय नाइट्रोजन में बदल देते हैं।
नाइट्रोजन प्रोटीन, DNA तथा RNA का आवश्यक घटक है, इसलिए नाइट्रोजन चक्र जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वायुमंडल में ऑक्सीजन लगभग 21% है। पौधे प्रकाश संश्लेषण में ऑक्सीजन छोड़ते हैं, जबकि जीव श्वसन में ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। दहन में भी ऑक्सीजन का उपयोग होता है। ऑक्सीजन का इन प्रक्रियाओं के बीच निरंतर आदान-प्रदान ऑक्सीजन चक्र कहलाता है।
जल पृथ्वी पर जीवन का आधार है। पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग जल से ढका है। जल के मुख्य उपयोग हैं — पीने, सिंचाई, उद्योग, सफाई तथा जल विद्युत उत्पादन में। जल की मात्रा पृथ्वी पर स्थिर है, परंतु उसका रूप बदलता रहता है। जल वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा तथा प्रवाह के द्वारा निरंतर घूमता रहता है, जिसे जल चक्र (Water Cycle) कहते हैं।
जल चक्र के चरण:
जल चक्र के कारण ही पृथ्वी पर जल की उपलब्धता सतत रहती है। जल का प्रदूषण (औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक खाद, कचरा) जल जीवों तथा मानव के लिए हानिकारक है। स्वच्छ जल की कमी तथा जल प्रदूषण गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ हैं।
मृदा (Soil) पृथ्वी की सतह की ऊपरी परत है, जिसमें खनिज, कार्बनिक पदार्थ, जल, वायु तथा सूक्ष्मजीव होते हैं। मृदा का निर्माण चट्टानों के अपक्षय (Weathering) से होता है। अपक्षय की प्रक्रियाएँ:
चट्टानों के कण, कार्बनिक पदार्थ (ह्यूमस), जल तथा वायु मिलकर मृदा बनाते हैं। मृदा का ह्यूमस (Humus) — जो मृत जीवों के अपघटन से बनता है — मृदा की उर्वरता बढ़ाता है। मृदा पौधों को आधार तथा पोषक तत्व प्रदान करती है, सूक्ष्मजीवों का घर है तथा जल को संग्रहीत करती है। मृदा अपरदन (Soil Erosion) — हवा तथा जल द्वारा मृदा के कणों का बह जाना — मृदा की उर्वरता को नष्ट करता है। वृक्षारोपण, समोच्च कृषि तथा बंध (डाइक) बनाने से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।
पृथ्वी के सभी जीवधारी — पौधे, जन्तु तथा सूक्ष्मजीव — जैव संसाधन हैं। जीव एक-दूसरे तथा पर्यावरण से जुड़े होते हैं। प्रकाश संश्लेषण करने वाले पौधे उत्पादक (Producers) हैं; जन्तु उपभोक्ता (Consumers) हैं; तथा अपघटक (जीवाणु, कवक) मृत जीवों को सरल पदार्थों में बदलते हैं। ये सभी मिलकर खाद्य श्रृंखला (Food Chain) तथा खाद्य जाल (Food Web) बनाते हैं। पौधे सीधे सूर्य की ऊर्जा को ग्रहण करते हैं, जो खाद्य श्रृंखला के माध्यम से सभी जीवों में प्रवाहित होती है।
जैव विविधता (Biodiversity) पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक है। वनों की कटाई, जन्तुओं का अंधाधुंध शिकार तथा आवासों का विनाश जैव विविधता को नष्ट करते हैं। जैव संसाधनों के संरक्षण के लिए अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान तथा वन्यजीव अभ्यारण्य स्थापित किए गए हैं।
| संसाधन | प्रकार | उपयोग |
|---|---|---|
| वायु | अजैव | श्वसन, दहन |
| जल | अजैव | पेय, सिंचाई |
| मृदा | अजैव | कृषि |
| पौधे | जैव | भोजन, ऑक्सीजन |
| जन्तु | जैव | भोजन, संतुलन |
| चक्र | प्रक्रियाएँ | महत्व |
|---|---|---|
| कार्बन चक्र | प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, अपघटन | CO₂ संतुलन |
| नाइट्रोजन चक्र | स्थिरीकरण, अमोनीकरण, नाइट्रिफिकेशन | प्रोटीन निर्माण |
| ऑक्सीजन चक्र | प्रकाश संश्लेषण, श्वसन | वायु में O₂ |
| गैस | प्रतिशत |
|---|---|
| नाइट्रोजन | 78% |
| ऑक्सीजन | 21% |
| कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य | 1% |
इस अध्याय में हमने सीखा कि वायु, जल, मृदा तथा जैव संसाधन ही पृथ्वी पर जीवन के मूल आधार हैं। वायुमंडल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसें होती हैं, जो श्वसन, प्रकाश संश्लेषण, दहन तथा सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, ऑक्सीजन चक्र तथा जल चक्र इन संसाधनों का संतुलन बनाए रखते हैं। नाइट्रोजन स्थिरीकरण राइज़ोबियम जैसे जीवाणुओं द्वारा होता है तथा प्रोटीन, DNA के निर्माण के लिए आवश्यक है। मृदा चट्टानों के अपक्षय से बनती है तथा ह्यूमस के कारण उर्वर होती है; मृदा अपरदन को रोकना आवश्यक है। जैव संसाधनों (पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव) से खाद्य श्रृंखला बनती है तथा पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। मानव की अंधाधुंध गतिविधियों से वायु, जल तथा मृदा प्रदूषित हो रहे हैं, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव, वैश्विक ऊष्मन तथा जैव विविधता की हानि हो रही है। इन संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग तथा संरक्षण ही सतत विकास का मार्ग है।